Wednesday, March 12, 2025

जम्मू-कश्मीर: आतंकविरोध और मानवाधिकार सुरक्षा रणनीति


जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद का मुकाबला करते हुए मानवाधिकारों की रक्षा करना भारत के लिए एक जटिल चुनौती रही है। भारतीय सुरक्षा बलों और सरकार ने इस क्षेत्र में आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान मानवाधिकारों के पालन के लिए एक बहुआयामी रणनीति अपनाई है, जिसमें परिचालन प्रोटोकॉल, कानूनी सुधार, संस्थागत निगरानी और सामुदायिक सहयोग शामिल हैं। यह लेख भारत की उन पहलों को गहराई से समझाता है जो सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती हैं।

आतंकवाद की चुनौती और मानवाधिकारों पर प्रभाव

जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान-प्रशिक्षित आतंकवादी समूहों द्वारा किए गए हिंसक हमलों ने न केवल सुरक्षा बलों बल्कि स्थानीय नागरिकों के जीवन को भी प्रभावित किया है। पाकिस्तानी सेना और ISI द्वारा समर्थित इन समूहों ने अमानवीय कृत्यों के माध्यम से क्षेत्र में भय का माहौल बनाया, जिससे भारत को नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप करना पड़ा। ऐसे में, भारतीय सेना का लक्ष्य न केवल आतंकवादियों को निष्प्रभावी करना है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करते हुए शांति बहाल करना भी है।

सेना की परिचालन नीतियाँ: मानवाधिकारों को प्राथमिकता

भारतीय सेना ने आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान मानवाधिकार सुनिश्चित करने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं:

1. न्यूनतम बल का सिद्धांत:

सेना के "दस आज्ञाओं" (1955) और "उप-पारंपरिक संचालन सिद्धांत" (2006) के अनुसार, सैन्य कर्मियों को केवल आतंकवादियों को लक्षित करना होता है। नागरिकों को हानि पहुँचाने या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से बचने के लिए सख्त दिशा-निर्देश हैं।

2. कमजोर वर्गों की सुरक्षा:

महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। तलाशी अभियान और घेराबंदी केवल आपात स्थितियों में ही की जाती है।

3. मानवाधिकार प्रशिक्षण:

सैन्य कर्मियों को प्रशिक्षण के दौरान मानवाधिकार मानकों से अवगत कराया जाता है। इससे संघर्ष क्षेत्रों में नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है।

कानूनी और संस्थागत ढाँचे की भूमिका

सरकार ने मानवाधिकार सुनिश्चित करने के लिए कानूनी प्रणाली को मजबूत किया है:

* AFSPA में सुधार:

सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) के दुरुपयोग को रोकने के लिए इसके दायरे को चरणबद्ध तरीके से सीमित किया गया है। उदाहरण के लिए, 2022 में नगालैंड और मणिपुर के कई क्षेत्रों से इसे हटाया गया।

* राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC):

NHRC सुरक्षा बलों के खिलाफ उठाए गए आरोपों की स्वतंत्र जाँच करता है। 1993 से अब तक, इसने सैकड़ों मामलों में मुआवजा और कार्रवाई सुनिश्चित की है।

* सेना का मानवाधिकार प्रकोष्ठ:

1993 में स्थापित यह प्रकोष्ठ उल्लंघनों की शिकायतों की त्वरित जाँच करता है। 2019 में शोपियां मुठभेड़ मामले में तुरंत जाँच शुरू करना इसकी पारदर्शिता का उदाहरण है।

सामुदायिक सहयोग: 'दिल और दिमाग जीतने' की पहल

आतंकवाद की जड़ों को समाप्त करने के लिए, भारत ने जम्मू-कश्मीर में विकासात्मक और शैक्षणिक पहलों पर जोर दिया है:

* ऑपरेशन सद्भावना:

सेना द्वारा संचालित इस कार्यक्रम के तहत 40 से अधिक "गुडविल स्कूल" स्थापित किए गए हैं, जो हजारों बच्चों को शिक्षित करते हैं। साथ ही, चिकित्सा शिविर, व्यावसायिक प्रशिक्षण और बुनियादी ढाँचे के विकास से स्थानीय लोगों का विश्वास जीता जा रहा है।

* युवाओं को रोजगार:

उग्रवाद की ओर झुकाव रोकने के लिए युवाओं को कौशल विकास प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान किए जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन

भारत ने आतंकवाद निरोधक उपायों में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को भी पूरा किया है:

* FATF मानक:

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिए FATF दिशा-निर्देशों का पालन करती है।

* संयुक्त राष्ट्र सहयोग:

2021-22 में भारत ने UN सुरक्षा परिषद की आतंकवाद निरोधक समिति की अध्यक्षता करते हुए वैश्विक सुरक्षा पहलों में योगदान दिया।

चुनौतियाँ और आगे की राह

हालाँकि कश्मीर में 2019 के बाद से सुरक्षा स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं:

* आतंकवादियों का छद्म युद्ध:

आतंकवादी नागरिकों के बीच छिपकर सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं, जिससे नागरिक हताहतों का जोखिम बढ़ता है।

* मानवाधिकार आरोपों का प्रबंधन:

कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा लगाए गए आरोपों का तथ्य-आधारित खंडन करना आवश्यक है।

निष्कर्ष: सुरक्षा और मानवाधिकारों का सह-अस्तित्व

जम्मू-कश्मीर में भारत की रणनीति दोहरे उद्देश्य पर केंद्रित है: आतंकवाद का सख्ती से मुकाबला करते हुए नागरिक अधिकारों की रक्षा करना। सेना के प्रोटोकॉल, सरकार के कानूनी सुधार और सामुदायिक पहलें इस संतुलन को प्रदर्शित करती हैं। जैसे-जैसे क्षेत्र में शांति स्थापित हो रही है, यह आशा की जाती है कि भारत एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करेगा जो वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों और सुरक्षा के समन्वय का उदाहरण बनेगा।

राजेश सिंह 

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