छत्तीसगढ़ में संघर्ष से त्रस्त आदिवासी समुदायों के लिए शांति की नई आशा
छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में दशकों से चल रहे हिंसक संघर्ष में एक नया मोड़ आया है। 50 से अधिक मानवाधिकार संगठनों और लगभग 150 प्रमुख कार्यकर्ताओं ने एक साथ आकर केंद्र सरकार और माओवादी विद्रोहियों से बिना शर्त युद्धविराम और शांति वार्ता की मांग की है। आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ती हिंसा और विस्थापन के बीच यह मांग और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
यह संयुक्त आवाज ऐसे समय में उठी है जब छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में हिंसा चरम पर है और 'ऑपरेशन कगार' के नाम से जाने जाने वाले सैन्य अभियान के परिणामस्वरूप मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है।
माओवादियों ने किया शांति वार्ता का प्रस्ताव, सरकार क्या करेगी?
हालिया घटनाक्रम में, प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) ने 28 मार्च को शांति वार्ता की इच्छा व्यक्त की, लेकिन इसके साथ उन्होंने शर्त रखी कि सरकार माओवादी विरोधी अभियान बंद करे और नए सुरक्षा शिविरों का निर्माण रोके। छत्तीसगढ़ सरकार ने बातचीत के लिए अपनी तैयारी जताई, लेकिन किसी भी पूर्व शर्त को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
छत्तीसगढ़ के उप-मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट किया, "हम बिना किसी शर्त के वार्ता के लिए तैयार हैं, लेकिन ऑपरेशन कगार को रोकने की शर्त स्वीकार नहीं की जा सकती।" उन्होंने आगे कहा, "हमारा लक्ष्य है माओवादियों को मुख्यधारा में लाना, न कि उन्हें अलग-थलग करना।"
केंद्रीय गृह मंत्री का बस्तर दौरा: क्या है सरकार का रुख?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 4-5 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के दो दिवसीय दौरे के दौरान उन्होंने बस्तर पंडुम समारोह में मां दंतेश्वरी के दर्शन किए और आदिवासी समुदायों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने माओवादियों से हथियार छोड़ने और मुख्यधारा में वापस आने की अपील की।
शाह ने कहा, "हथियारों से आप आदिवासी विकास को नहीं रोक सकते। मुख्यधारा में वापस आएं - आत्मसमर्पण करें और बस्तर की प्रगति का हिस्सा बनें।" उन्होंने उल्लेख किया कि 2025 में अब तक 521 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है, जबकि 2024 में यह संख्या 881 थी।
ऑपरेशन कगार: आदिवासियों के लिए सुरक्षा या खतरा?
नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं का कहना है कि 'ऑपरेशन कगार' के नाम से जाना जाने वाला नक्सल विरोधी अभियान, जिसे कथित तौर पर आदिवासी क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने के लिए शुरू किया गया था, वास्तव में स्थानीय समुदायों के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।
मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इस अभियान के तहत 2024 में 287 और 2025 में 113 सहित 400 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। संयुक्त बयान में कहा गया है, "माओवादी करार दिए गए लोगों में से कई को बाद में ग्रामीणों ने नागरिक के रूप में पहचाना। यह स्पष्ट है कि नागरिक असमान रूप से प्रभावित हुए हैं।"
मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध: अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रश्न?
बस्तर क्षेत्र में सक्रिय युवा आदिवासी संगठन 'मूलवासी बचाओ मंच' पर नवंबर 2024 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया। यह संगठन सैन्यीकरण, निगमीकरण और विस्थापन के खिलाफ अभियान चला रहा था, साथ ही पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (पेसा) और वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों की वकालत कर रहा था।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने इस प्रतिबंध की कड़ी निंदा की और इसे "लोकतांत्रिक आंदोलन के संवैधानिक अधिकारों की हत्या" बताया। कई नागरिक संगठनों का मानना है कि इस तरह के प्रतिबंध शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को कुचलने का प्रयास हैं।
सलवा जुडूम की याद: क्या इतिहास दोहराया जा रहा है?
नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं ने राज्य समर्थित, अब प्रतिबंधित सलवा जुडूम मिलिशिया द्वारा अत्याचारों की याद दिलाई, जिसे 20 साल पहले शुरू किया गया था। सलवा जुडूम अभियान के दौरान हत्याएं, गांवों को जलाना, यौन हिंसा, भुखमरी और सामूहिक विस्थापन हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में सलवा जुडूम को अवैध घोषित किया था, लेकिन अधिकार समूहों का आरोप है कि सरकार ने इस फैसले का पालन नहीं किया है। बयान में कहा गया है, "सरकार ने एसपीओ को भंग करने और ऑपरेशन में पूर्व माओवादियों का उपयोग बंद करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी की है। इसके बजाय, इसने डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड और बस्तर फाइटर्स का विस्तार किया है।"
विकास के नाम पर विस्थापन: आदिवासियों की चिंताएं
बस्तर क्षेत्र में 160 से अधिक नए सुरक्षा शिविरों की स्थापना - अक्सर गाँव की ज़मीन पर - ने आदिवासी समुदायों को चिंतित कर दिया है। नागरिक समाज संगठनों का कहना है कि अब लगभग हर नौ नागरिकों पर एक सुरक्षाकर्मी है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और परिवहन जैसी बुनियादी सेवाएँ सड़क निर्माण की गति से पीछे हैं।
साथ ही, खनन फर्मों के साथ सरकारी समझौता ज्ञापनों ने बेदखली, विस्थापन और पर्यावरण क्षरण की आशंकाओं को और गहरा कर दिया है। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी का कहना है, "विकास के नाम पर हमारी जमीन छीनी जा रही है। हमारे पास न तो मुआवजा है और न ही रोजगार।"
शांति प्रक्रिया में आदिवासियों की भूमिका
संयुक्त बयान में कहा गया है कि आदिवासी बहुल क्षेत्र - छत्तीसगढ़ में बस्तर, झारखंड में पश्चिमी सिंहभूम और महाराष्ट्र में गढ़चिरौली - संघर्ष के केंद्र बने हुए हैं और "स्थानीय निवासियों का जीवन और कल्याण किसी भी शांति प्रक्रिया में पहली प्राथमिकता होनी चाहिए"।
नागरिक समाज संगठनों ने समावेशी शांति वार्ता का आग्रह किया है, जिसमें जोर दिया गया है कि आदिवासियों को समान हितधारकों के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। उन्होंने कैद आदिवासियों की रिहाई और वार्ता प्रक्रिया में उनकी भागीदारी की मांग की है।
क्या छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का समाधान संभव है?
वर्तमान स्थिति में, सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ में चल रहे संघर्ष का कोई स्थायी समाधान संभव है? सामाजिक विश्लेषक मानते हैं कि बिना आदिवासी समुदायों की भागीदारी के किसी भी शांति प्रक्रिया के सफल होने की संभावना कम है।
छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर.एन. सिंह का कहना है, "जब तक इस क्षेत्र के मूल निवासियों की आवाज को सुना नहीं जाएगा, तब तक कोई भी सैन्य समाधान अस्थायी ही होगा। हमें एक ऐसी समावेशी शांति प्रक्रिया की आवश्यकता है जो सभी पक्षों के हितों का सम्मान करे।"
आगे की राह: क्या है संघर्ष का समाधान?
मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि शांति प्रक्रिया शुरू करने के लिए कुछ तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए:
1. केंद्र और राज्य सरकारों को सभी सैन्य अभियानों पर रोक लगानी चाहिए
2. माओवादियों को न्यायेतर हत्याओं और आईईडी विस्फोटों को रोकना चाहिए
3. शांति वार्ता में आदिवासी प्रतिनिधियों को शामिल करना चाहिए
4. संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक विकास पर ध्यान देना चाहिए
5. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सलवा जुडूम के फैसले को पूरी तरह से लागू करना चाहिए
निष्कर्ष: शांति की आशा अभी जिंदा है
दशकों के संघर्ष के बावजूद, छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों में शांति की आशा अभी भी जीवित है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों का अनुरोध है कि सभी पक्ष हिंसा के बजाय संवाद का मार्ग चुनें।
जैसा कि संयुक्त बयान में कहा गया है, "हम दोनों पक्षों से आदिवासियों और अन्य ग्रामीणों के सर्वोत्तम हितों पर विचार करने और संवैधानिक, लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों पर आधारित वार्ता में शामिल होने का आह्वान करते हैं।" अंततः, यही एकमात्र मार्ग है जो इस क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास ला सकता है।
राजेश सिंह



