Sunday, April 6, 2025

आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ते संघर्ष के बीच: सिविल सोसायटियो ने युद्धविराम की मांग उठाई

छत्तीसगढ़ में संघर्ष से त्रस्त आदिवासी समुदायों के लिए शांति की नई आशा

छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में दशकों से चल रहे हिंसक संघर्ष में एक नया मोड़ आया है। 50 से अधिक मानवाधिकार संगठनों और लगभग 150 प्रमुख कार्यकर्ताओं ने एक साथ आकर केंद्र सरकार और माओवादी विद्रोहियों से बिना शर्त युद्धविराम और शांति वार्ता की मांग की है। आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ती हिंसा और विस्थापन के बीच यह मांग और भी महत्वपूर्ण हो गई है।

यह संयुक्त आवाज ऐसे समय में उठी है जब छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में हिंसा चरम पर है और 'ऑपरेशन कगार' के नाम से जाने जाने वाले सैन्य अभियान के परिणामस्वरूप मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है।

माओवादियों ने किया शांति वार्ता का प्रस्ताव, सरकार क्या करेगी?

हालिया घटनाक्रम में, प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) ने 28 मार्च को शांति वार्ता की इच्छा व्यक्त की, लेकिन इसके साथ उन्होंने शर्त रखी कि सरकार माओवादी विरोधी अभियान बंद करे और नए सुरक्षा शिविरों का निर्माण रोके। छत्तीसगढ़ सरकार ने बातचीत के लिए अपनी तैयारी जताई, लेकिन किसी भी पूर्व शर्त को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

छत्तीसगढ़ के उप-मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट किया, "हम बिना किसी शर्त के वार्ता के लिए तैयार हैं, लेकिन ऑपरेशन कगार को रोकने की शर्त स्वीकार नहीं की जा सकती।" उन्होंने आगे कहा, "हमारा लक्ष्य है माओवादियों को मुख्यधारा में लाना, न कि उन्हें अलग-थलग करना।"

केंद्रीय गृह मंत्री का बस्तर दौरा: क्या है सरकार का रुख?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 4-5 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के दो दिवसीय दौरे के दौरान उन्होंने बस्तर पंडुम समारोह में मां दंतेश्वरी के दर्शन किए और आदिवासी समुदायों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने माओवादियों से हथियार छोड़ने और मुख्यधारा में वापस आने की अपील की।

शाह ने कहा, "हथियारों से आप आदिवासी विकास को नहीं रोक सकते। मुख्यधारा में वापस आएं - आत्मसमर्पण करें और बस्तर की प्रगति का हिस्सा बनें।" उन्होंने उल्लेख किया कि 2025 में अब तक 521 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है, जबकि 2024 में यह संख्या 881 थी।

ऑपरेशन कगार: आदिवासियों के लिए सुरक्षा या खतरा?

नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं का कहना है कि 'ऑपरेशन कगार' के नाम से जाना जाने वाला नक्सल विरोधी अभियान, जिसे कथित तौर पर आदिवासी क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने के लिए शुरू किया गया था, वास्तव में स्थानीय समुदायों के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।

मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इस अभियान के तहत 2024 में 287 और 2025 में 113 सहित 400 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। संयुक्त बयान में कहा गया है, "माओवादी करार दिए गए लोगों में से कई को बाद में ग्रामीणों ने नागरिक के रूप में पहचाना। यह स्पष्ट है कि नागरिक असमान रूप से प्रभावित हुए हैं।"

मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध: अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रश्न?

बस्तर क्षेत्र में सक्रिय युवा आदिवासी संगठन 'मूलवासी बचाओ मंच' पर नवंबर 2024 में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया। यह संगठन सैन्यीकरण, निगमीकरण और विस्थापन के खिलाफ अभियान चला रहा था, साथ ही पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (पेसा) और वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों की वकालत कर रहा था।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने इस प्रतिबंध की कड़ी निंदा की और इसे "लोकतांत्रिक आंदोलन के संवैधानिक अधिकारों की हत्या" बताया। कई नागरिक संगठनों का मानना है कि इस तरह के प्रतिबंध शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को कुचलने का प्रयास हैं।

सलवा जुडूम की याद: क्या इतिहास दोहराया जा रहा है?

नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं ने राज्य समर्थित, अब प्रतिबंधित सलवा जुडूम मिलिशिया द्वारा अत्याचारों की याद दिलाई, जिसे 20 साल पहले शुरू किया गया था। सलवा जुडूम अभियान के दौरान हत्याएं, गांवों को जलाना, यौन हिंसा, भुखमरी और सामूहिक विस्थापन हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में सलवा जुडूम को अवैध घोषित किया था, लेकिन अधिकार समूहों का आरोप है कि सरकार ने इस फैसले का पालन नहीं किया है। बयान में कहा गया है, "सरकार ने एसपीओ को भंग करने और ऑपरेशन में पूर्व माओवादियों का उपयोग बंद करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी की है। इसके बजाय, इसने डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड और बस्तर फाइटर्स का विस्तार किया है।"

विकास के नाम पर विस्थापन: आदिवासियों की चिंताएं

बस्तर क्षेत्र में 160 से अधिक नए सुरक्षा शिविरों की स्थापना - अक्सर गाँव की ज़मीन पर - ने आदिवासी समुदायों को चिंतित कर दिया है। नागरिक समाज संगठनों का कहना है कि अब लगभग हर नौ नागरिकों पर एक सुरक्षाकर्मी है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और परिवहन जैसी बुनियादी सेवाएँ सड़क निर्माण की गति से पीछे हैं।

साथ ही, खनन फर्मों के साथ सरकारी समझौता ज्ञापनों ने बेदखली, विस्थापन और पर्यावरण क्षरण की आशंकाओं को और गहरा कर दिया है। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी का कहना है, "विकास के नाम पर हमारी जमीन छीनी जा रही है। हमारे पास न तो मुआवजा है और न ही रोजगार।"

शांति प्रक्रिया में आदिवासियों की भूमिका

संयुक्त बयान में कहा गया है कि आदिवासी बहुल क्षेत्र - छत्तीसगढ़ में बस्तर, झारखंड में पश्चिमी सिंहभूम और महाराष्ट्र में गढ़चिरौली - संघर्ष के केंद्र बने हुए हैं और "स्थानीय निवासियों का जीवन और कल्याण किसी भी शांति प्रक्रिया में पहली प्राथमिकता होनी चाहिए"।

नागरिक समाज संगठनों ने समावेशी शांति वार्ता का आग्रह किया है, जिसमें जोर दिया गया है कि आदिवासियों को समान हितधारकों के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। उन्होंने कैद आदिवासियों की रिहाई और वार्ता प्रक्रिया में उनकी भागीदारी की मांग की है।

क्या छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का समाधान संभव है?

वर्तमान स्थिति में, सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ में चल रहे संघर्ष का कोई स्थायी समाधान संभव है? सामाजिक विश्लेषक मानते हैं कि बिना आदिवासी समुदायों की भागीदारी के किसी भी शांति प्रक्रिया के सफल होने की संभावना कम है।

छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर.एन. सिंह का कहना है, "जब तक इस क्षेत्र के मूल निवासियों की आवाज को सुना नहीं जाएगा, तब तक कोई भी सैन्य समाधान अस्थायी ही होगा। हमें एक ऐसी समावेशी शांति प्रक्रिया की आवश्यकता है जो सभी पक्षों के हितों का सम्मान करे।"

आगे की राह: क्या है संघर्ष का समाधान?

मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि शांति प्रक्रिया शुरू करने के लिए कुछ तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए:

1. केंद्र और राज्य सरकारों को सभी सैन्य अभियानों पर रोक लगानी चाहिए

2. माओवादियों को न्यायेतर हत्याओं और आईईडी विस्फोटों को रोकना चाहिए

3. शांति वार्ता में आदिवासी प्रतिनिधियों को शामिल करना चाहिए

4. संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक विकास पर ध्यान देना चाहिए

5. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सलवा जुडूम के फैसले को पूरी तरह से लागू करना चाहिए

निष्कर्ष: शांति की आशा अभी जिंदा है

दशकों के संघर्ष के बावजूद, छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों में शांति की आशा अभी भी जीवित है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों का अनुरोध है कि सभी पक्ष हिंसा के बजाय संवाद का मार्ग चुनें।

जैसा कि संयुक्त बयान में कहा गया है, "हम दोनों पक्षों से आदिवासियों और अन्य ग्रामीणों के सर्वोत्तम हितों पर विचार करने और संवैधानिक, लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों पर आधारित वार्ता में शामिल होने का आह्वान करते हैं।" अंततः, यही एकमात्र मार्ग है जो इस क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास ला सकता है।

राजेश सिंह

Friday, April 4, 2025

UNHRC-58 में भारत ने लैंगिक समानता की वैश्विक मिसाल कायम की


जिनेवा, 2 अप्रैल 2025: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC-58) के 58वें सत्र के दौरान आयोजित एक साइड इवेंट में भारत ने लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की प्रगति को वैश्विक मंच पर रेखांकित किया। राजस्थान समग्र कल्याण संस्थान (RSKS इंडिया) द्वारा आयोजित "ब्रेकिंग बैरियर: एडवांसिंग जेंडर इक्विटी एंड एम्पावरमेंट वीमेन इन इंडिया" कार्यक्रम में देश की नीतियों, योजनाओं और सामाजिक बदलाव की प्रेरक कहानियों को साझा किया गया।

शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता: महिला सशक्तिकरण की नींव

RSKS इंडिया के CEO एस.एन. शर्मा ने बताया कि "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" और "मुद्रा योजना" जैसे कार्यक्रमों ने ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में महिलाओं को शिक्षा व रोजगार से जोड़ा है। 2024 के आँकड़ों के अनुसार, मुद्रा योजना से 40% लाभार्थी महिलाएँ हैं, जिन्होंने सूक्ष्म उद्यम शुरू किए। वहीं, पंचायती राज संस्थाओं में 33% आरक्षण के कारण 14 लाख से अधिक महिलाएँ स्थानीय नेतृत्व की भूमिका में हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांति: आयुष्मान भारत और आशा कार्यकर्ताओं का योगदान

स्वास्थ्य विशेषज्ञ फैजा रिफात ने आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान को गर्भवती महिलाओं के लिए वरदान बताया। 2025 तक, 80% ग्रामीण महिलाएँ नियमित स्वास्थ्य जाँच से जुड़ चुकी हैं। आशा कार्यकर्ताओं के प्रयासों से मातृ मृत्यु दर में 30% की गिरावट दर्ज की गई है।

कृषि क्षेत्र में महिलाओं का नेतृत्व: एफपीओ और तकनीकी प्रगति

इंडिया वाटर फाउंडेशन के अरविंद कुमार ने बताया कि महिला-नेतृत्व वाले किसान उत्पादक संगठन (FPO) देश के 50% कृषि उत्पादन में योगदान दे रहे हैं। सरकार ने 2023 में "महिला किसान सशक्तिकरण योजना" शुरू की, जिसके तहत 10,000 एफपीओ को तकनीकी व वित्तीय सहायता दी जा रही है।

एसटीईएम शिक्षा में बढ़ती भागीदारी: नई शिक्षा नीति का प्रभाव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और इंस्पायर कार्यक्रमों ने महिलाओं को विज्ञान-तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ाया है। 2024 में, IITs और NITs में महिला छात्रों का नामांकन 25% से बढ़कर 35% हुआ है। पूनम शर्मा ने बताया कि 50% से अधिक स्टार्टअप्स में महिलाएँ संस्थापक या सह-संस्थापक हैं।

जम्मू-कश्मीर में लैंगिक न्याय: प्रगति और चुनौतियाँ

असमा शोरा ने जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी (35% पंचायत सदस्य) और शिक्षा दर (75%) को सराहा। हालाँकि, मानवाधिकार कार्यकर्ता जावेद अहमद बेग ने POJK और गिलगित-बाल्टिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के हनन पर चिंता जताई। उन्होंने UN से इन क्षेत्रों में हस्तक्षेप की माँग की।

जल संरक्षण और पर्यावरण: महिलाओं की अग्रणी भूमिका

जल प्रबंधन विशेषज्ञ श्वेता त्यागी ने जल जीवन मिशन के तहत 12 करोड़ घरों में नल कनेक्शन पहुँचाने में महिलाओं के योगदान को रेखांकित किया। 2025 तक, 60% जल समितियों का नेतृत्व महिलाएँ कर रही हैं, जो जल संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा दे रही हैं।

भविष्य की राह: वैश्विक सहयोग और सतत प्रयास

कार्यक्रम के समापन में पर्यावरणविद् साई संपत ने लैंगिक समानता के लिए वैश्विक साझेदारी पर जोर दिया। उन्होंने SDG-5 (लैंगिक समानता) के लक्ष्यों को 2030 तक पूरा करने में भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया। अतिरिक्त जानकारी के अनुसार, भारत 2025-30 के लिए "महिला उद्यमिता परिषद" बनाने की योजना पर काम कर रहा है, जो 5 लाख महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण देगी।

इस प्रकार, UNHRC-58 में भारत ने न केवल अपनी उपलब्धियों को प्रदर्शित किया, बल्कि वैश्विक समुदाय को लैंगिक न्याय के लिए एकजुट होने का संदेश भी दिया।

राजेश सिंह


Thursday, April 3, 2025

USCIRF ने भारत की रॉ एजेंसी पर प्रतिबंध की मांग की: अल्पसंख्यक सुरक्षा पर संकट

यूएससीआईआरएफ की चौंकाने वाली सिफारिशें

संयुक्त राज्य अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) पर प्रतिबंध लगाने और अमेरिकी हथियारों की बिक्री की समीक्षा करने की सिफारिश की है। यह कदम भारत में बढ़ते अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा, धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमनात्मक कार्रवाइयों को लेकर उठाया गया है। USCIRF ने भारत को लगातार छठे वर्ष 'विशेष चिंता वाले देश' (CPC) की सूची में शामिल करने की भी अनुशंसा की है।

2025 की रिपोर्ट में क्या है खास?

USCIRF की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों (मुसलमान, ईसाई, सिख) के खिलाफ हिंसा और भेदभावपूर्ण नीतियों में बढ़ोतरी हुई है। 2024 के आम चुनावों के दौरान भाजपा नेताओं द्वारा अल्पसंख्यक-विरोधी बयानबाजी, मस्जिदों का विध्वंस और गौरक्षकों द्वारा हमले प्रमुख चिंताएं हैं। रिपोर्ट में यह भी उजागर किया गया कि सरकार ने संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को कमजोर करते हुए भारत को एक "हिंदू राष्ट्र" बनाने की कोशिश की है।

मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों को दबाने का आरोप लगाया गया है। USCIRF के अनुसार, पिछले एक दशक में नागरिकता संशोधन कानून (CAA), गौरक्षा समितियों को प्रोत्साहन और धार्मिक स्थलों के विध्वंस जैसे कदमों ने सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा दिया है। 2023 में, ओपन डोर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा के 687 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 40% अधिक हैं।

अंतरराष्ट्रीय दमन की नई रणनीति

रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया कि भारत सरकार ने विदेशों में रहने वाले सिख और मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, कनाडा और अमेरिका में सिख कार्यकर्ताओं पर रॉ की निगरानी और धमकियों के आरोप लगे हैं। USCIRF ने अमेरिकी कांग्रेस से 2024 का 'अंतरराष्ट्रीय दमन रिपोर्टिंग अधिनियम' पारित करने की अपील की है, जो ऐसी कार्रवाइयों की निगरानी करेगा।

आईएएमसी का दबाव और अमेरिकी प्रतिक्रिया

भारतीय अमेरिकी मुस्लिम परिषद (IAMC) ने USCIRF की सिफारिशों का समर्थन करते हुए अमेरिका से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। IAMC के कार्यकारी निदेशक रशीद अहमद के अनुसार, "मोदी सरकार का दमन केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी नागरिकों को भी प्रभावित कर रहा है।" हालांकि, भारत सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए USCIRF को "पूर्वाग्रही और अवैज्ञानिक" बताया है।

भारत के लिए क्या हैं निहितार्थ?

यदि अमेरिका USCIRF की सिफारिशों को मानता है, तो भारत-अमेरिका रक्षा समझौतों (जैसे 2023 का GE-414 जेट इंजन डील) पर प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, CPC का टैग लगने से भारत की वैश्विक छवि को झटका लगेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत को आंतरिक मानवाधिकार सुधारों के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाएगा।

निष्कर्ष: सुधार की अपील के साथ चुनौतियां

USCIRF की रिपोर्ट भारत के लिए एक चेतावनी है। धार्मिक सद्भाव बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीकरण के लिए सरकार को अल्पसंख्यक सुरक्षा और न्यायिक पारदर्शिता पर काम करना होगा। साथ ही, विदेश नीति में नरमी और अमेरिका जैसे सहयोगियों के साथ रचनात्मक संवाद की आवश्यकता है।

राजेश सिंह 



Tuesday, April 1, 2025

न्याय में देरी, मानवाधिकार संकट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों की चेतावनी

"सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी एन श्रीकृष्ण ने भारत में 5 करोड़ लंबित मामलों और मानवाधिकारों के गहरे संकट पर चिंता जताई। जानिए न्यायिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर क्यों मंडरा रहा है खतरा।"

"न्याय में देरी, न्याय से इनकार है।" यह चेतावनी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी एन श्रीकृष्ण ने एक राष्ट्रीय सम्मेलन में दी। उन्होंने देश में 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों को मानवाधिकारों के "गहरे संकट" का कारण बताया। साथ ही, उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बढ़ते दबाव को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया।

लोकतांत्रिक अधिकारों और धर्मनिरपेक्षता पर सम्मेलन में श्रीकृष्ण ने कहा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता और कानून का शासन दोनों संकट में हैं। "असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन आज यह अधिकार सिमट रहा है," उन्होंने जोर देकर कहा। पिछले एक दशक से न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव और अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधों को उन्होंने गंभीर चुनौती बताया।

पूर्व जज ए के पटनायक ने हिरासत में मौतों और फर्जी मुठभेड़ों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, "जिन संस्थाओं को लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करनी थी, वे ही उनका सबसे ज़्यादा उल्लंघन कर रही हैं।" उन्होंने समाज में बढ़ती असमानता और धन के केंद्रीकरण को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सत्ता के दुरुपयोग पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग और CAG जैसी संस्थाएं सरकार के "एजेंट" बन गई हैं। "UAPA और NSA जैसे कानूनों का इस्तेमाल विरोधियों को दबाने के लिए किया जा रहा है," भूषण ने आरोप लगाया। उन्होंने लोगों से डर छोड़कर अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का आह्वान किया।

सम्मेलन में पेश आंकड़े चौंकाने वाले हैं:

* देशभर की अदालतों में 5.5 करोड़ मामले लंबित।

* जेलों में 77% कैदी बिना सुनवाई के बंद हैं।

* 2022 में हिरासत में 1,882 मौतें दर्ज की गईं।

* 2021 में 31,677 बलात्कार के मामले सामने आए।

मणिपुर हिंसा को उदाहरण देते हुए बताया गया कि 175 लोगों की मौत और 60,000 लोगों के विस्थापन के बावजूद न्याय की प्रक्रिया धीमी है। संयुक्त राष्ट्र के मानव स्वतंत्रता सूचकांक 2023 में भारत 109वें स्थान पर है, जो 2015 के मुकाबले 9% गिरावट दर्शाता है।

सम्मेलन ने दो प्रस्ताव पारित किए:

1. मानवाधिकार आंदोलन को मज़बूत करने के लिए नागरिकों और बुद्धिजीवियों का गठजोड़ बनाना।

2. फिलिस्तीन में मानवाधिकार हनन के विरोध में वैश्विक एकजुटता दिखाना।

सीपीडीआरएस (CPDRS) के बारे में जानकारी देते हुए बताया गया कि इसकी स्थापना न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर और पत्रकार कुलदीप नैयर ने की थी। संगठन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाना है।

न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण के शब्दों में, "लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब हर नागरिक को बराबरी का हक़ मिले।" हालाँकि, न्यायिक देरी, दमनकारी कानून और संस्थाओं के पक्षपातपूर्ण रवैये के चलते यह लक्ष्य अभी दूर है। जैसा कि सम्मेलन में कहा गया, "न्याय की उम्मीद ही लोकतंत्र की नींव है।

धन्यवाद 

राजेश सिंह 

आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ते संघर्ष के बीच: सिविल सोसायटियो ने युद्धविराम की मांग उठाई

छत्तीसगढ़ में संघर्ष से त्रस्त आदिवासी समुदायों के लिए शांति की नई आशा छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में दशकों से चल रहे हिंसक संघर्ष में एक नया...