साइबर फ्रॉड के मामले में पुलिस की लापरवाही और जांच में देरी को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। हाल ही में, एक 70 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक महिला के साथ हुए साइबर फ्रॉड के मामले में मुंबई पुलिस की जांच प्रक्रिया पर नाराजगी जताते हुए, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साइबर फ्रॉड के मामले में FIR दर्ज करना और जांच करना पुलिस की जिम्मेदारी है, चाहे धोखाधड़ी की राशि कितनी भी कम क्यों न हो।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला मुंबई की 70 वर्षीय लीला पार्थसारथी का है, जो एक सेवानिवृत्त गणित शिक्षिका हैं। उन्हें जालसाजों ने 'डिजिटल गिरफ्तारी' के झांसे में फंसाया और उनसे 32 लाख रुपये ठग लिए। जालसाजों ने खुद को प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारी बताया और महिला को आधार कार्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मांगे। उन्होंने यह भी दावा किया कि महिला के बैंक खातों में 'अपराध की आय' जमा है और उसे सुरक्षित करने के लिए पैसे ट्रांसफर करने को कहा।
इस झांसे में आकर महिला ने कुल 32 लाख रुपये जालसाजों को ट्रांसफर कर दिए। जब उन्हें धोखाधड़ी का एहसास हुआ, तो उन्होंने मुंबई के गोवंडी इलाके के शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करने की कोशिश की। हालांकि, पुलिस ने शुरू में उनकी FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया और कहा कि उनके पास 'बड़े घोटालों' की जांच करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।
बॉम्बे हाईकोर्ट का सख्त रुख
मामले की सुनवाई करते हुए, बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पुलिस की लापरवाही पर नाराजगी जताई। न्यायमूर्ति रेवती मोहिते-डेरे और न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले ने कहा कि "पुलिस यह नहीं कह सकती कि उनके पास बड़े मामलों की जांच करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। साइबर फ्रॉड के मामले में FIR दर्ज करना और जांच करना पुलिस का कर्तव्य है, चाहे धोखाधड़ी की राशि कितनी भी कम क्यों न हो।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि "जब कोई नागरिक, खासकर एक वरिष्ठ नागरिक, पुलिस के पास शिकायत लेकर आता है, तो उसे यह नहीं कहा जा सकता कि उनके पास बड़े मामलों की जांच करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। यह पुलिस का कर्तव्य है कि वह तुरंत FIR दर्ज करे और मामले की जांच शुरू करे।"
10 लाख रुपये की सीमा पर सवाल
सुनवाई के दौरान, पुलिस अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि मुंबई साइबर सेल 10 लाख रुपये से कम के साइबर फ्रॉड के मामलों की जांच नहीं करता है। इस पर कोर्ट ने सख्त प्रतिक्रिया दी और कहा कि "यह क्या हो रहा है? अगर कोई वरिष्ठ नागरिक 50 हजार रुपये की धोखाधड़ी की शिकायत लेकर आता है, तो क्या पुलिस उसकी जांच नहीं करेगी? धोखाधड़ी चाहे छोटी हो या बड़ी, उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि "10 लाख रुपये की यह सीमा क्यों? अगर किसी ने 9.50 लाख रुपये खो दिए हैं, तो क्या होगा? क्या पुलिस उसकी जांच नहीं करेगी? यह अनुचित है और नागरिकों के साथ अन्याय है।"
गृह मंत्रालय का स्पष्टीकरण
सुनवाई के दौरान, गृह मंत्रालय (MHA) के एक पुलिस उपायुक्त (DCP) ने कोर्ट को बताया कि मंत्रालय ने कभी भी साइबर सेल को 10 लाख रुपये से कम के मामलों की जांच न करने की सलाह नहीं दी है। उन्होंने कहा कि "धोखाधड़ी चाहे छोटी हो या बड़ी, उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। कोई भी राशि किसी के लिए छोटी नहीं होती, खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए।"
साइबर फ्रॉड के मामलों में त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता
कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह साइबर फ्रॉड के मामलों में तुरंत FIR दर्ज करे और जांच शुरू करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि "साइबर फ्रॉड के मामलों में समय पर कार्रवाई करना बेहद जरूरी है। अगर पुलिस तुरंत कदम उठाती है, तो धोखाधड़ी में शामिल पैसे को वापस पाने की संभावना बढ़ जाती है।"
निष्कर्ष
बॉम्बे
हाईकोर्ट के इस फैसले ने साइबर फ्रॉड के मामलों में पुलिस की जिम्मेदारी को स्पष्ट
कर दिया है। अब पुलिस को चाहे धोखाधड़ी की राशि कितनी भी कम क्यों न हो, FIR दर्ज करके जांच शुरू करनी होगी। यह
फैसला न केवल साइबर फ्रॉड के शिकार लोगों के लिए राहत भरा है, बल्कि पुलिस को उनकी जिम्मेदारी का
एहसास दिलाने वाला भी है।
साइबर फ्रॉड
के खिलाफ लड़ाई में जागरूकता और त्वरित कार्रवाई ही सबसे बड़ा हथियार है। अगर आप
या आपके परिवार का कोई सदस्य साइबर फ्रॉड का शिकार होता है, तो तुरंत पुलिस से संपर्क करें और FIR दर्ज करवाएं।
राजेश सिंह
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