Tuesday, March 4, 2025

अभिव्यक्ति की आजादी पर मोदी सरकार का प्रहार


देश की जनता तक सूचनाएँ न पहुँचे इसके लिए मोदी सरकार ने इस महीने दो काम किया है पहला 10 फरवरी, 2025 को, 125 साल पुरानी तमिलनाडु से छपने वाली पत्रिका 'विकटन'  के वेबसाइट को ब्लॉक किया जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक कार्टून प्रकाशित किया  गया था, जिसमें वे कुर्सी पर बैठे हैं और उनके हाथ-पैर हथकड़ियों और बेड़ियों से बंधे हुए हैं। उनके बगल में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प बैठे हैं, उनकी उंगलियाँ हथकड़ियों और  बेड़ियों की ओर इशारा कर रही हैं, और उनके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान है। उक्त पत्रिका के वेबसाइट को बिना किसी कारण बताए बहुत ही बेतुके तरीके से,  केंद्र सरकार द्वारा कथित तौर पर उस कार्टून और ‘विकटन’ तक पहुँच को ब्लॉक कर दिया गया। तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सहित कई राजनीतिक दलों ने वेबसाइट और कार्टून को कथित तौर पर ब्लॉक करने की निंदा की है, क्योंकि यह प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन है, जो संविधान द्वारा गारंटीकृत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से निकलती है।

और दुसरा  रेल मंत्रालय ने नैतिक मानदंडों और संभावित कानूनी मुद्दों का हवाला देते हुए एक्स को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर  भगदड़ से हताहतों के वीडियो के 285 लिंक हटाने का आदेश दिया  है। 21, फरवरी 2025 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित अदिति अग्रवाल की रिपोर्ट के मुताबिक रेल मंत्रालय ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) को 15 फरवरी को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ से हताहतों के वीडियो वाले 285 सोशल मीडिया लिंक हटाने का निर्देश दिया है, जो दिसंबर में सीधे हटाने की शक्ति प्राप्त करने के बाद से इसकी पहली बड़ी सामग्री पर प्रवर्तन कार्रवाई है। इस मामले से अवगत लोगों के अनुसार, मंत्रालय ने "नैतिक मानदंडों" और प्लेटफ़ॉर्म की अपनी सामग्री नीति का हवाला देते हुए 17 फरवरी को नोटिस भेजा, जिसमें 36 घंटे में एक्स (पूर्व में ट्विटर) को कार्रवाई करने को कहा गया है।

यह कार्रवाई 24 दिसंबर को दिए गए नए अधिकार से उपजी है, जब रेल मंत्रालय ने अपने कार्यकारी निदेशक सूचना और प्रचार (रेलवे बोर्ड) को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा वीडियो 79 उन्यासी (3)(बी) के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को सीधे टेकडाउन नोटिस जारी करने का अधिकार दिया। पहले, इस तरह के अनुरोध आईटी मंत्रालय की धारा 69 उनहत्तर  ए ब्लॉकिंग समिति के माध्यम से भेजे जाते थे। नोटिस में सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(1)(डी) का भी हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार “वास्तविक जानकारी” मिलने पर- चाहे वह न्यायालय के आदेश के रूप में हो या “अधिकृत एजेंसी” द्वारा अधिसूचना के रूप में- मध्यस्थ को 36 घंटों के भीतर अवैध सामग्री को हटाना होगा। इसमें आईटी नियमों के नियम 7 का भी हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार कोई भी मध्यस्थ जो नियमों का पालन नहीं करता है, वह अपना सुरक्षित ठिकाना खो देता है।

क्या वाकई वे सभी 285 वीडियो  जिन्हे चिन्हित किया गया है ऐसे हैं जो गैरकानूनी हैं ? अगर नहीं तो यह कार्रवाई मोदी सरकार के नकारेपन को छुपाने के लिए फासिस्ट का पोषण करने वाले तथाकथित नियमों का हवाला देकर किया गया है.

और तमिल पत्रिका  विकटन की वेबसाइट को ब्लॉक करना, न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि कानून का भी उल्लंघन है

बिना कोई कारण बताए वेबसाइट को बंद करने का संघ का निर्णय प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। इस पर बलपूर्वक कार्रवाई न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बल्कि कार्टून के विषय-वस्तु और अंतर्निहित संदेश के बारे में जानकारी प्राप्त करने के नागरिक के अधिकार को भी कुचलती है। ऐसी कार्रवाई यह दर्शाता है कि सरकार ने 'विकटन' के दोषी होने का अनुमान लगा लिया है, जबकि ऐसे मामले में  न्यायालय द्वारा कोई निर्णय लिया भी नहीं जा सकता।

हाल ही में, संसद में केंद्रीय बजट पेश किए जाने से पहले, सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण 2024-2025 रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार और उद्यमियों के बीच विश्वास को बढ़ावा देने और आर्थिक विकास और प्रगति को सक्षम करने के लिए, विनियमन के संचालन सिद्धांत को ‘निर्दोष साबित होने तक दोषी’ के मानदंड से बदलकर ‘दोषी साबित होने तक निर्दोष’ की स्थिति में बदलने की आवश्यकता है।

दुर्भाग्य से ‘विकटन’ के मामले में, केंद्र सरकार ने विरोधाभासी रुख अपनाया है, और आपराधिक न्याय के उदार सिद्धांत और व्यापक रूप से कानून की अनदेखी की है, जिसके अनुसार आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता। बिना किसी पूर्व सूचना या आधिकारिक स्पष्टीकरण के वेबसाइट को ब्लॉक करने का यही एकमात्र संभावित स्पष्टीकरण है।

13 फरवरी, 2025 को, अरबपति गौतम अडानी के अमेरिकी अभियोग पर व्हाइट हाउस में एक अमेरिकी रिपोर्टर द्वारा पूछे गए सवाल को टालते हुए, प्रधान मंत्री मोदी ने भारत की समृद्ध लोकतांत्रिक स्थिति के बारे में बात की। उसी समय की अवधि में 'विकटन' की पहुँच को अवरुद्ध करना दर्शाता है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया केवल बयानबाजी थी। यह आलोचनात्मक पत्रकारिता पर लक्षित हमले से कम नहीं है।

पक्षपातपूर्ण उद्देश्यों के लिए राज्य की शक्ति का उपयोग

यह देखना और भी अधिक भयावह है कि भारतीय जनता पार्टी (‘भाजपा’) की तमिलनाडु इकाई द्वारा कार्टून पर आपत्ति जताने और इसके खिलाफ लिखने के तुरंत बाद वेबसाइट पहुंच से बाहर यानि अनट्रेसेबल हो गई। 15 फरवरी, 2025 को, तमिलनाडु राज्य के भाजपा अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने कहा कि उनकी इकाई ने प्रेस परिषद और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को डीएमके का मुखपत्र होने और आपत्तिजनक और निराधार सामग्री प्रकाशित करने के लिए 'विकटन' पत्रिका के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करने के लिए प्रेस परिषद और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस मामले में निर्णय लेने के लिए अभ्यावेदन प्रस्तुत किया है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी का व्यंग्य करने वाले कार्टून को उनके शासन और पार्टी द्वारा अस्वीकार्य पाया गया है। लेकिन क्या यह स्पष्ट रूप से स्पष्ट नहीं करता है कि कार्टून और वेबसाइट को डिजिटल रूप से पहुंच से बाहर यानि अनट्रेसेबल करने का राज्य का निर्णय स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण विचारों से प्रेरित था?

प्रेस की स्वतंत्रता पर इस तरह के हमले पत्रकारिता के प्रति शासन की असहिष्णुता की गवाही देते हैं जो सत्ता के चेहरे को आईना दिखाती है। यह सब 2019 से विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की रैंकिंग में लगातार गिरावट को पर्याप्त रूप से उचित ठहराता है। आज, यह 180 देशों में से 159 एक सौ उनसठवें स्थान पर है।

औपनिवेशिक मौन आदेशों की याद

105 साल पहले, 1920 में, महात्मा गांधी द्वारा लिखित ‘पंजाब अव्यवस्थाओं पर कांग्रेस  की रिपोर्ट’ प्रकाशित हुई थी। यह रिपोर्ट पंजाब के अमृतसर में हुए क्रूर जलियांवाला बाग हत्याकांड के तुरंत बाद आई थी। 13 अप्रैल, 1919 को रॉलेट एक्ट का विरोध कर रहे 400 से 1500 लोगों की ब्रिगेडियर आर.ई.एच. डायर के आदेश पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्याओं के बाद, गांधी ने कहा कि स्थानीय प्रेस को चुप कराकर जनमत का व्यवस्थित दमन किया गया था। बाहर के पत्रकारों को पंजाब में हो रही घटनाओं को कवर करने से रोक दिया गया था। गांधी ने लिखा, “मार्शल लॉ शासन के दौरान स्वतंत्र पत्रकारिता का अस्तित्व असंभव हो गया है।”

2025 में, भारत में न तो आपातकाल की घोषणा हुई है और न ही मार्शल लॉ लागू है, फिर भी प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ सरकार, अपने इस दावे के विपरीत कि भारत ‘लोकतंत्र की जननी’ है, स्वतंत्र पत्रकारिता और पत्रकारों के खिलाफ कई कदम उठाकर लगातार प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंट रही है। मोदी को जंजीरों में जकड़े हुए दिखाने वाली 'विकटन' वेबसाइट तक पहुँच को रोकने का तात्कालिक मामला असहमति को दबाने के उनके बड़े पैटर्न में से एक है।

कार्टूनों पर नेहरू के विचार

बात बात पर नेहरू को कोसने वाले संघ और बीजेपी के लोगों को यह जानने की जरूरत है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मशहूर तत्कालीन कार्टूनिस्ट शंकर पिल्लई से कहा था कि वे अपने रेखाचित्रों में नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों का कार्टून बनाते समय उन्हें न बख्शें।

फरवरी 1937 में पिल्लई के कार्टूनों की सराहना करते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, "शंकर के पास वह दुर्लभ प्रतिभा है, जो भारत में अन्य जगहों की तुलना में दुर्लभ है, और बिना किसी द्वेष या दुर्भावना के, वे एक कलाकार के कौशल के साथ, सार्वजनिक मंच पर खुद को प्रदर्शित करने वालों की कमज़ोरियों और दुर्बलताओं को इंगित करते हैं। कभी-कभी हमारे अहंकार का पर्दा फट जाना अच्छा होता है।"

देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे कुछ प्रासंगिक प्रश्न पूछे जाने चाहिए। क्या प्रधानमंत्री मोदी के कार्टून और 'विकटन' को इसलिए रोका गया क्योंकि इसने वास्तव में सरकार द्वारा ओढ़े गए अहंकार के परदे को फाड़ दिया? वास्तव में कार्टून और वेबसाइट को पहुंच से बाहर या अनट्रेसेबल करने की कार्रवाई वर्तमान शासन में नेताओं की राजनीतिक असुरक्षा को दर्शाती है, जो नेहरू के विपरीत, कला के माध्यम से अपनी “कमज़ोरियों” की आलोचना किए जाने के प्रति न तो सराहना करते हैं और न ही प्रतिरक्षित हैं।

लेकिन नेहरू के शब्दों में “कभी-कभी हमारे अहंकार का पर्दा फट जाना अच्छा होता है।” मोदी सरकार द्वारा अवरुद्ध किये गए कार्टून ने उन भारतीयों की दुर्दशा को उजागर करने के अपने उद्देश्य को पूरा करता है, जिन्हें ट्रम्प प्रशासन हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ कर और सम्मान से वंचित करके, तथा उन्हें बुरी तरह जलील करते हुए अमेरिका से निर्वासित कर रहा है। और व्हाइट हॉउस के ट्वीटर हैंडल से उनके वीडियो को प्रसारित कर रहा हैं, जिनमें अवैध भारतीय प्रवासियों को एलियन तक संबोधित किया जा रहा है निर्वासन के इस विभस्त तरीके पर भारतीय सरकार की चुप्पी को यह कार्टून दर्शाता है। इस कार्टून ने भारत सरकार के अहंकार को तोड़ने का उद्देश्य पूरा किया और 'विकटन समूह' को दुर्लभ साहस दिखाने के लिए बधाई दी जानी चाहिए। निश्चित रूप से, यदि आलोचनात्मक पत्रकारिता की भावना, सार्वजनिक तर्क और लोकतंत्र की नींव को संरक्षित किया जाना है, तो दूसरों को भी इस उदाहरण को दोहराना चाहिए।

रेलवे द्वारा एक्स (पूर्व में ट्वीटर) को सामग्री हटाने के लिए दी गई नोटिस के मायने-

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ की जानकारी वाली सामग्री सोशल साइट एक्स से हटाने की नोटिस की अगर बात करें तो सूचना प्रौद्योगिकी (जनता द्वारा सूचना तक पहुँच को अवरुद्ध करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) की बात अगर की जाय तो नियम, 2009 की धारा 9 केंद्र सरकार को किसी भी सूचना तक जनता की पहुँच को अवरुद्ध करने की शक्ति प्रदान करती है। ऐसी शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है यदि यह "आवश्यक" या "समीचीन" और "उचित" हो। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 उनहत्तर ए में उल्लिखित आधारों पर सामग्री को अवरुद्ध किया जा सकता है, जो भारत की संप्रभुता और अखंडता, भारत की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों या सार्वजनिक व्यवस्था के हित में या उपरोक्त से संबंधित किसी भी संज्ञेय अपराध के कमीशन को रोकने के लिए हैं।  

जब मेंन स्ट्रीम मिडिया सत्ता की गोंद में बैठकर देश की जनता के विरुद्ध और सत्ताधारियों के बचाव की मुद्रा में है तो देश की जनता ने सरकार की नाकामियों को उजागर करने का जिम्मा सोशल मिडिया के माध्यम से अपने कंधे पर ले लिया है. इस जागरूकता से भयभीत होकर मोदी सरकार, जनता की सामग्री को सोशल मिडिया पर प्रदर्शित होने से रोकने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 उनहत्तर ए की आड़ में उक्त सामग्री को हटाने की नोटिस दी है.

हालांकि, 'विकटन' के मामले में  केंद्र सरकार ने न तो कोई सार्वजनिक नोटिस जारी किया है, न ही 'विकटन' को इस बारे में कुछ भी बताया है कि उसकी वेबसाइट को क्यों और किस कानून के तहत बंद किया गया।

वस्तुतः यह कार्रवाई एक डरे हुए फासिस्ट शासक की प्रतिक्रिया है जो कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बगल में बैठकर उसकी बदतमीजी को सर झुकाकर बर्दास्त कर लेता है किन्तु अपने देश में जनता तक सही सन्देश देने वाले कार्टून और कार्टून छापने वाली पत्रिका को बर्दास्त नहीं कर सकता, साथ ही सोशल मिडिया पर भी मोदी सरकार स्वयं के और विभिन्न मंत्रालयों के नकारेपन से हो रही मौतों की सही सूचनाओं तक जनता की पहुँच पर फासिस्ट कानून के माध्यम से रोक लगाकर न केवल अंधेरगर्दी पर उतारू है बल्कि इनके द्वारा जनता के लिए अन्धेरा निर्मित किया जा रहा है. जिससे देश की जनता इनके नकारेपन से रूबरू न हो सके. और न  ही इनकी नाकामियों को देख सके, भारत में फासिस्टों के अमृतकाल में लोकतन्त्र की परिभाषा- जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए को पलट कर "फासिस्टों का, फासिस्टों के द्वारा, तथा  फासिस्टों के लिए कर दिया गया है। “ बाहर भीगी बिल्ली घर में शेर” इस कहावत को चरितार्थ करते हुए रीढ़ बिहीन संघी को देख कर  स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा मेक्सिको और कोलंबियन प्रेसिडेंट के लिए मन में इज़्ज़त और बढ़ जाती है. और वहीं देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के उद्देश्य से एक कार्टून को अदृश्य करने के लिए 'विकटन' की वेबसाइट तक पहुँच को ब्लॉक कर दिए जाने, तथा सोशल मिडिया एक्स (पूर्व में ट्वीटर) से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ से हताहतों के वीडियो के 285 लिंक हटाने के फरमान जैसी कार्रवाई को देख कर मन खिन्न हो जाता है।    

धन्यवाद

राजेश सिंह 

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